Udanti Sitanadi Tiger Reserve : जंगल में पेड़ों की होगी सर्जरी! ‘ट्री डॉक्टर’ विजय निशांत ने संभाली कमान, अतिक्रमण 22 से बढ़कर 102.47 हेक्टेयर पहुंचा

Udanti Sitanadi Tiger Reserve छत्तीसगढ़ के उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के करका वन क्षेत्र में क्षतिग्रस्त पेड़ों को बचाने के लिए विशेष अभियान शुरू किया गया है। यहां करीब 3,500 पेड़ों का वैज्ञानिक उपचार (Udanti Sitanadi Tiger Reserve) किया जाएगा। इन पेड़ों की छाल तने के चारों ओर से काटकर नुकसान पहुंचाया गया है। इन्हें बचाने के लिए कर्नाटक से पहुंचे वृक्ष संरक्षण विशेषज्ञ विजय निशांत ने कमान संभाली है। उन्हें ‘ट्री डॉक्टर’ के नाम से जाना जाता है और वे प्रोजेक्ट वृक्ष फाउंडेशन से जुड़े हैं।

3,500 पेड़ों को मिलेगा उपचार

वन विभाग के अनुसार, पेड़ की छाल को तने के चारों ओर काट देने की प्रक्रिया को ‘गर्डलिंग’ कहा जाता है। इससे पेड़ के भीतर पोषक तत्वों का परिवहन बाधित हो जाता है। नतीजतन पेड़ धीरे-धीरे कमजोर होकर सूख सकता है और उसकी मृत्यु भी हो सकती है।

करका वन क्षेत्र में ऐसे पेड़ों को बचाने के लिए विशेषज्ञों की मदद से उपचार, वैज्ञानिक सर्वेक्षण और नियमित निगरानी की व्यवस्था की जा रही है। टाइगर रिजर्व (Udanti Sitanadi Tiger Reserve) में शुरू हुई यह पहल क्षतिग्रस्त वन संपदा को बचाने की दिशा में अहम मानी जा रही है।

 

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ड्रोन सर्वे में बड़ा खुलासा

प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, ड्रोन सर्वेक्षण और उपग्रह चित्रों के तुलनात्मक विश्लेषण से करका वन क्षेत्र में बड़े पैमाने पर नुकसान का अनुमान सामने आया है। पिछले एक दशक में यहां 1.25 लाख से अधिक पेड़ों के नष्ट किए जाने का अनुमान है। आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2016 में वन क्षेत्र में अतिक्रमण करीब 22 हेक्टेयर था, जो वर्ष 2026 में बढ़कर 102.47 हेक्टेयर तक पहुंच गया। करका वन क्षेत्र (Udanti Sitanadi Tiger Reserve) में अतिक्रमण का बढ़ता दायरा वन संरक्षण के सामने गंभीर चुनौती को दर्शाता है।

 

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पेड़ों की हालत के अनुसार सर्जरी

ट्री डॉक्टर विजय निशांत के मार्गदर्शन में चिह्नित 3,500 पेड़ों को उनकी स्थिति और दोबारा जीवित होने की संभावना के आधार पर चार श्रेणियों में बांटा गया है। इसका उद्देश्य हर पेड़ की जरूरत के अनुसार उपचार तय करना और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करना है।

पहली श्रेणी में ऐसे पेड़ हैं, जिन्हें तत्काल प्राथमिक उपचार की जरूरत है। इनमें नमी बनाए रखने, घाव को सुरक्षित रखने और आगे होने वाले नुकसान को रोकने के लिए ट्री बैंडेजिंग जैसी तकनीक अपनाई जाएगी। दूसरी श्रेणी में ऐसे पेड़ शामिल हैं, जिनके जीवित रहने की अनुमानित संभावना 50 से 75 प्रतिशत है। इनके लिए ब्रिज ग्राफ्टिंग यानी सेतु कलम तकनीक और उचित देखभाल अपनाई जा सकती है।

तीसरी श्रेणी में गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त वे पेड़ हैं, जिनके जीवित रहने की अनुमानित संभावना 50 प्रतिशत से कम है। इन्हें बचाने के लिए बार-बार उपचार, जड़ों की देखभाल और विशेषज्ञों की निगरानी की जरूरत हो सकती है।

चौथी श्रेणी में ऐसे पेड़ रखे जाएंगे, जिन्हें विशेषज्ञ पूरी तरह मृत और उपचार से दोबारा जीवित होने में असमर्थ पाएंगे। ऐसे पेड़ों को जरूरत के अनुसार चुनिंदा रूप से काटा जा सकता है, ताकि जीवित जड़ों या ठूंठ से नई कोंपलें निकलने की संभावना बनी रहे। हालांकि, पेड़ों के बचने का वास्तविक परिणाम उनकी प्रजाति, नुकसान की गंभीरता और उपचार के असर पर निर्भर करेगा।

 

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Udanti Sitanadi Tiger Reserve हर पेड़ का बनेगा रिकॉर्ड

अभियान के तहत चिह्नित पेड़ों को अलग-अलग क्रमांक दिए गए हैं। प्रत्येक पेड़ की प्रजाति, अनुमानित आयु, तने की गोलाई, क्षति की सीमा और पेड़ को नुकसान पहुंचाए जाने के अनुमानित समय जैसी जानकारियां दर्ज की जा रही हैं।

इन रिकॉर्ड के आधार पर विशेषज्ञ तय कर सकेंगे कि किस पेड़ को तत्काल उपचार की जरूरत है, किसे सामान्य देखभाल से बचाया जा सकता है और किन पेड़ों की लंबे समय तक निगरानी करनी होगी। उपचार के बाद भी पेड़ों की स्थिति पर नजर रखी जाएगी, ताकि तकनीकों की प्रभावशीलता का आकलन किया जा सके। उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व (Udanti Sitanadi Tiger Reserve) में यह दस्तावेजीकरण भविष्य में क्षतिग्रस्त पेड़ों के संरक्षण की अधिक प्रभावी रणनीति बनाने में मदद कर सकता है।

 

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ग्राफ्टिंग से बचाने की कोशिश

पेड़ों के उपचार के लिए विशेषज्ञों की निगरानी में ब्रिज ग्राफ्टिंग और ट्री बैंडेजिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। ब्रिज ग्राफ्टिंग में पेड़ के तने के क्षतिग्रस्त हिस्से के ऊपर जीवित ऊतकों के बीच संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। इससे पोषक तत्वों का परिवहन दोबारा शुरू करने में मदद मिल सकती है।

इसके अलावा घाव की देखभाल के लिए मधुमक्खी के मोम और संतरे के तेल का उपयुक्त इस्तेमाल, जड़ों तक उपचारात्मक पदार्थ पहुंचाने तथा विशेषज्ञों की सलाह से जड़ों को मजबूत करने वाले पदार्थों और पौध वृद्धि हार्मोन का इस्तेमाल किया जा सकता है। प्रत्येक पेड़ की स्थिति के अनुसार उपचार की विधि तय होगी।

 

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100 से अधिक वनकर्मी जुटे

इस विशेष अभियान में उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के 100 से अधिक मैदानी वनकर्मी भाग ले रहे हैं। इनके साथ ट्री डॉक्टर विजय निशांत, नगरी से पहुंचे हॉर्टिकल्चर एक्सटेंशन ऑफिसर चंद्रप्रकाश साहू, बीरबल और ग्राफ्टिंग विशेषज्ञों की टीम भी काम कर रही है।

इस संयुक्त प्रयास का उद्देश्य क्षतिग्रस्त पेड़ों का उपचार करने के साथ वनकर्मियों की तकनीकी क्षमता बढ़ाना भी है, ताकि भविष्य में ऐसे पेड़ों की देखभाल और निगरानी लगातार की जा सके। अभियान के दौरान जिन पेड़ों को अतिरिक्त उपचार की जरूरत होगी, उनकी पहचान कर आगे की कार्ययोजना बनाई जाएगी।

 

 

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प्राकृतिक सुधार का भी अध्ययन

मैदानी निरीक्षण के दौरान कुछ ऐसे पेड़ भी मिले हैं, जिनकी छाल को नुकसान पहुंचने के बावजूद प्रभावित हिस्सों में नए ऊतक विकसित होने के संकेत दिखाई दिए हैं। विशेषज्ञ इन पेड़ों का रिकॉर्ड तैयार कर अध्ययन करेंगे, ताकि यह समझा जा सके कि किन परिस्थितियों में कुछ पेड़ गंभीर क्षति के बाद भी प्राकृतिक रूप से स्वस्थ होने लगते हैं।

पेड़ की प्रजाति, आयु, शारीरिक स्थिति, घाव की गंभीरता और क्षति के बाद बीता समय उसके पुनर्जीवन में अहम भूमिका निभा सकता है। प्राकृतिक रूप से स्वस्थ हो रहे पेड़ों और उपचार किए जा रहे पेड़ों की तुलना से भविष्य में अधिक प्रभावी उपचार पद्धति विकसित करने में मदद मिल सकती है।

 

 

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पैरी नदी के लिए भी अहम

करका वन क्षेत्र पैरी नदी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र का हिस्सा है। पैरी नदी का उद्गम उदंती वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्र में होता है। आगे चलकर पैरी और सोंढूर नदियां राजिम में मिलकर महानदी का निर्माण करती हैं। महानदी छत्तीसगढ़ और ओडिशा की प्रमुख नदी प्रणालियों में शामिल है।

इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में वन आवरण को नुकसान पहुंचने से जैव विविधता, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास, मिट्टी संरक्षण और जलग्रहण क्षेत्र की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। इसलिए क्षतिग्रस्त पेड़ों को बचाने के साथ बचे हुए वन क्षेत्र की सुरक्षा और अतिक्रमण रोकना भी जरूरी है।

उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व (Udanti Sitanadi Tiger Reserve) का यह अभियान हजारों क्षतिग्रस्त पेड़ों को दोबारा स्वस्थ होने का अवसर देने की पहल है। इसकी सफलता विशेषज्ञों के उपचार, वनकर्मियों की सतत निगरानी और आने वाले समय में पेड़ों की वास्तविक स्थिति पर निर्भर करेगी।

 

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