छत्तीसगढ़ सरकार प्राकृतिक, जैविक और टिकाऊ कृषि (Natural Farming Initiative) को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में किसान हितैषी नीतियों और कृषि विभाग के मार्गदर्शन का सकारात्मक असर अब गांवों में दिखाई देने लगा है। किसान आधुनिक तकनीकों के साथ पारंपरिक एवं पर्यावरण अनुकूल खेती को अपनाकर खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बना रहे हैं। प्राकृतिक खेती पहल के तहत महासमुंद जिले के एक किसान ने इसका प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया है।
ढैंचा की हरी खाद से जैविक खेती की नई शुरुआत
महासमुंद जिले के विकासखंड बसना अंतर्गत ग्राम बड़ेसाजापाली के प्रगतिशील किसान हिमांशु बंजारे ने 0.80 हेक्टेयर कृषि भूमि में ढैंचा की हरी खाद की फसल लगाकर जैविक खेती की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है। लगभग 30 दिन की इस फसल को निर्धारित समय पर खेत में पलटकर हरी खाद के रूप में उपयोग किया जाएगा, जिससे मिट्टी की उर्वराशक्ति बढ़ेगी, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी तथा आगामी फसलों (Natural Farming Initiative) की उत्पादकता में वृद्धि होगी। प्राकृतिक खेती पहल किसानों को कम लागत में अधिक लाभ की दिशा में आगे बढ़ा रही है।
किसान बोले- कम होगी लागत, सुधरेगी मिट्टी की सेहत
किसान हिमांशु बंजारे का कहना है कि जैविक एवं प्राकृतिक खेती न केवल खेती की लागत कम करती है, बल्कि लंबे समय तक मिट्टी की गुणवत्ता भी बनाए रखती है। उन्होंने बताया कि ढैंचा जैसी हरी खाद वाली फसलों के उपयोग से खेतों में प्राकृतिक रूप से पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है और उत्पादन अधिक टिकाऊ बनता है। उन्होंने अन्य किसानों से भी इस पद्धति को अपनाने की अपील की। प्राकृतिक खेती पहल खेती को आत्मनिर्भर और पर्यावरण अनुकूल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
Natural Farming Initiative हरी खाद से बढ़ती है मिट्टी की उर्वरता
उप संचालक कृषि एफ.आर. कश्यप ने बताया कि हरी खाद मिट्टी की उर्वरता और संरचना सुधारने का अत्यंत प्रभावी माध्यम है। ढैंचा, सन, लोबिया, उड़द, मूंग और ग्वार जैसी दलहनी फसलें कम समय में तैयार होकर कम लागत में अधिक जैविक पदार्थ (Natural Farming Initiative) उपलब्ध कराती हैं। इन फसलों को फूल आने से पहले खेत में पलटने पर प्रति हेक्टेयर लगभग 50 से 60 किलोग्राम तक नाइट्रोजन की आपूर्ति होती है, जिससे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता काफी कम हो जाती है।
पर्यावरण संरक्षण में भी निभा रही महत्वपूर्ण भूमिका
उन्होंने बताया कि हरी खाद (Natural Farming Initiative) के नियमित उपयोग से मिट्टी भुरभुरी बनती है, जलधारण क्षमता बढ़ती है, वायु संचार बेहतर होता है तथा अम्लीय एवं क्षारीय भूमि का संतुलन भी सुधरता है। इससे मृदा में सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ती है और उत्पादन क्षमता में दीर्घकालिक वृद्धि होती है। प्राकृतिक खेती पहल मृदा संरक्षण और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी अहम योगदान दे रही है।
सरकार प्राकृतिक खेती को दे रही बढ़ावा
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार किसानों को टिकाऊ, कम लागत और पर्यावरण-अनुकूल खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। कृषि विभाग किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और जागरूकता उपलब्ध करा रहा है, जिससे प्रदेश में प्राकृतिक एवं जैविक खेती का दायरा लगातार बढ़ रहा है। हिमांशु बंजारे जैसे प्रगतिशील किसानों की पहल इस बात का प्रमाण है कि प्राकृतिक खेती (Natural Farming Initiative) पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ मिट्टी और सुरक्षित कृषि व्यवस्था का आधार बन रही है।

