लोकेश्वर सिन्हा गरियाबंद….. छत्तीसगढ़ में विकास के तमाम दावों के बीच गरियाबंद जिले से आई एक तस्वीर ने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है। यहां सड़क नहीं होने की वजह से एक विशेष पिछड़ी जनजाति की प्रसव पीड़ित महिला को एंबुलेंस तक नहीं मिल सकी और उनके परिजनों को उसे खाट पर लादकर 3 किलोमीटर दूर तक पैदल चलना पड़ा। यह मामला गरियाबंद जिले के सबसे पिछड़े माने जाने वाले विशेष पिछड़ी जनजाति के कमार जाति के एक परिवार की पीड़ा है जो मैनपुर ब्लॉक का है।
इस विशेष पिछड़ी जनजाति के कमार जाति के लोगो को राष्ट्रपति के दतक पुत्र भी कहे जाते है।
घटना क्या है?….
जिले के मैनपुर ब्लॉक के घुमरापदर पंचायत के कमारपारा का है। यहां विशेष पिछड़ी जनजाति (PVTG) के कमार परिवार निवास करते हैं। जानकारी के अनुसार कमारपारा निवासी एक गर्भवती महिला को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हुई। परिजनों ने तत्काल 108 एंबुलेंस को फोन किया, लेकिन गांव तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क ही नहीं है। कच्चा, पथरीला और बारिश से खराब हो चुका रास्ता होने के कारण एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच सकी।
हालत बिगड़ते देख परिवार के सामने कोई चारा नहीं बचा। परिजनों और ग्रामीणों ने हिम्मत दिखाई और महिला को खाट (चारपाई) पर लिटाकर कंधे पर उठा लिया। इसी तरह करीब 3 किलोमीटर का कठिन सफर तय कर वे मुख्य सड़क तक पहुंचे। वहां पहले से इंतजार कर रही आपातकालीन वाहन (108) से महिला को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, उरमाल ले जाया गया।
राहत की बात यह रही कि समय पर स्वास्थ्य केंद्र पहुंचने से जच्चा-बच्चा दोनों सुरक्षित हैं और मां ने एक स्वस्थ शिशु को जन्म दिया है। डॉक्टरों के अनुसार यदि थोड़ी और देर होती तो बड़ा हादसा हो सकता था।
जनमन योजना के दावों पर सवाल….
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस कमार जनजाति को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी PM जनमन (PM-JANMAN) योजना चलाई जा रही है, उसी समुदाय तक आज भी बुनियादी सुविधा – सड़क – नहीं पहुंच पाई है। सरकार करोड़ों रुपये PVTG परिवारों के विकास, सड़क, बिजली, पानी और स्वास्थ्य पर खर्च करने का दावा कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत घुमरापदर कमारपारा की इस घटना से सामने आ गई है।
कई बार सरपंच, जनपद और कलेक्टर तक सड़क की मांग को लेकर गुहार लगाई है, लेकिन आज तक सिर्फ आश्वासन ही मिला है। बरसात के दिनों में तो स्थिति और भी भयावह हो जाती है, तब गांव पूरी तरह से टापू बन जाता है।
सबसे बड़ा सवाल – कब जागेगा प्रशासन?…..
आखिर कब तक कमारपारा जैसे विशेष पिछड़ी जनजाति के गांवों को सड़क के लिए तरसना पड़ेगा?
क्या जनमन योजना के कागजी दावों से बाहर निकलकर प्रशासन जमीनी हकीकत देखेगा?
क्या अगली बार भी किसी गर्भवती, बीमार या बुजुर्ग को खाट के सहारे ही अस्पताल जाना पड़ेगा?
यदि आज जच्चा-बच्चा को कुछ हो जाता तो इसका जिम्मेदार कौन होता?
यह घटना केवल एक महिला की पीड़ा नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम की नाकामी की कहानी है जो अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने का दावा करता है। अब देखना होगा कि इस वायरल तस्वीर के बाद जिला प्रशासन नींद से जागता है या अगली खाट की कहानी का इंतजार करता है।

सड़क नहीं तो एंबुलेंस नहीं, 3 KM तक खाट पर ढोकर ले गए परिजन
जनमन योजना के दावों की खुली पोल