छत्तीसगढ़ में लगातार हो रही मानसूनी बारिश के बीच कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को धान की बुआई (Dhan Ki Buwai) को लेकर महत्वपूर्ण सलाह जारी की है। अधिक वर्षा और खेतों में जलभराव की स्थिति को देखते हुए किसानों को लेही विधि से धान की बुआई करने की सलाह दी गई है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जिन क्षेत्रों में लगातार बारिश के कारण खेतों में पर्याप्त पानी जमा हो गया है और सामान्य तरीके से रोपाई संभव नहीं है, वहां लेही विधि किसानों के लिए बेहतर विकल्प साबित हो सकती है।
देरी से पहुंचा मानसून, अब कई इलाकों में अच्छी बारिश
छत्तीसगढ़ में सामान्य तौर पर बस्तर क्षेत्र के रास्ते मानसून का आगमन 14 जून के आसपास होता है, लेकिन इस वर्ष अल नीनो प्रभाव के कारण मानसून लगभग 10 दिन देरी से पहुंचा। वर्तमान में प्रदेश के सभी कृषि जलवायु क्षेत्रों जैसे बस्तर का पठार, छत्तीसगढ़ का मैदानी क्षेत्र और उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र में मानसूनी बारिश सक्रिय हो चुकी है।
कृषि विभाग (Dhan Ki Buwai) के अनुसार जून महीने में प्रदेश में सामान्य रूप से लगभग 21 सेंटीमीटर बारिश होती है, लेकिन इस वर्ष जून में करीब 40 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई। हालांकि 1 जुलाई से 6 जुलाई के बीच हुई अच्छी बारिश ने स्थिति में सुधार किया है। छत्तीसगढ़ के मैदानी क्षेत्रों और बस्तर पठार में हुई अधिक वर्षा से मानसून का अब तक का कोटा लगभग पूरा हो चुका है।
खेत में पानी भरने पर अपनाएं लेही विधि
कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि जिन खेतों (Dhan Ki Buwai) में पर्याप्त पानी उपलब्ध है, वहां मचाई कर नर्सरी तैयार होने पर धान की रोपाई करें। यदि नर्सरी उपलब्ध नहीं है तो किसान अंकुरित बीजों की लेही विधि से बुआई कर सकते हैं। लेही विधि में अंकुरित धान के बीजों को तैयार खेत में ड्रम सीडर या छिटकवा विधि से बोया जाता है। यह विधि लगातार बारिश वाले क्षेत्रों में उपयोगी साबित होती है। किसानों को सलाह दी गई है कि बीज और नर्सरी को कार्बेन्डाजिम जैसे कवकनाशी तथा जैव उर्वरकों से उपचारित करने के बाद ही बुआई करें।
धान की बुआई और रोपाई की समय सीमा तय
कृषि विभाग (Dhan Ki Buwai) के अनुसार इस वर्ष हरेली तिहार 12 अगस्त को मनाया जाएगा। किसान भाई धान की सीधी बुआई 15 जुलाई तक कर सकते हैं। वहीं रोपाई और बियासी पद्धति से खेती करने वाले किसान 30 जुलाई तक यह कार्य पूरा कर लें। किसी कारणवश यदि हरेली तक बुआई या रोपाई में देरी होती है तो उत्पादन पर बहुत अधिक असर नहीं पड़ेगा। हालांकि किसानों को समय पर खेती कार्य पूरा करने की सलाह दी गई है।
कम अवधि वाली धान किस्मों के उपयोग की सलाह
इस वर्ष मानसून देरी से आने के कारण किसानों को शीघ्र और मध्यम अवधि में पकने वाली धान (Dhan Ki Buwai) की किस्मों का चयन करने की सलाह दी गई है। इनमें इन्द्रावती धान, बस्तर धान-1, छत्तीसगढ़ बारानी धान, इंदिरा एरोबिक धान, एमटीयू-1010, एमटीयू-1153, एमटीयू-1156, एमटीयू-1001, विक्रम टीसीआर, छत्तीसगढ़ धान-1919, छत्तीसगढ़ तेजस्वी धान और महामाया जैसी किस्में शामिल हैं। कृषि विभाग के अनुसार एक एकड़ में सीधी बुआई और बियासी के लिए लगभग 30 किलो बीज, रोपा पद्धति के लिए 20 किलो और हाइब्रिड प्रजातियों के लिए 6 किलो बीज का उपयोग किया जाना चाहिए।
लेही विधि में ऐसे करें बीज तैयार
लेही विधि (Dhan Ki Buwai) से बुआई के लिए किसानों को मध्यम अवधि वाली किस्मों का चयन करना चाहिए। इसके लिए प्रति एकड़ करीब 40 किलो बीज की आवश्यकता होती है। बीज को 8 से 10 घंटे पानी में भिगोने के बाद पानी निकाल दें। इसके बाद बीज को बोरे से ढककर 24 से 30 घंटे तक रखें। अंकुर निकलने के बाद इन्हें छाया में फैलाकर ड्रम सीडर या छिटकवा विधि से खेत में बोया जा सकता है। बीज उपचार के लिए एक किलो बीज में ढाई ग्राम कार्बेन्डाजिम या अन्य उपयुक्त कवकनाशी का उपयोग करने की सलाह दी गई है।
खरपतवार नियंत्रण बेहद जरूरी
कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को खरपतवार नियंत्रण पर भी विशेष ध्यान देने को कहा है। धान की सीधी बुआई (Dhan Ki Buwai) में खरपतवार बड़ी समस्या बन सकते हैं। यदि समय पर नियंत्रण नहीं किया गया तो उत्पादन में 50 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। बुआई के बाद शुरुआती 40 दिनों तक खेत को खरपतवार मुक्त रखना जरूरी है। इसके लिए हाथ से निंदाई, पैडी वीडर या कृषि विभाग की सलाह के अनुसार खरपतवार नाशक दवाओं का उपयोग किया जा सकता है।

Dhan Ki Buwai उर्वरक प्रबंधन में रखें संतुलन
किसानों (Dhan Ki Buwai) को सलाह दी गई है कि एक एकड़ भूमि में अधिकतम 2 बोरी यूरिया और 1 बोरी डीएपी का उपयोग करें। डीएपी की पूरी मात्रा बुआई या रोपाई (Dhan Ki Buwai) से पहले दें। वहीं यूरिया का प्रयोग 30-35 दिन और 60-70 दिन बाद किस्तों में किया जाए। कृषि विभाग ने बताया कि प्राथमिक सहकारी समितियों में यूरिया, डीएपी, एनपीके, सिंगल सुपर फास्फेट और पोटाश का पर्याप्त भंडारण किया गया है। किसानों को पिछले वर्ष की तरह ही उर्वरक उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है।
कृषि सलाह केंद्रों से ले सकते हैं जानकारी
कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि धान की खेती से जुड़े किसी भी निर्णय से पहले कृषि वैज्ञानिकों और विभागीय अधिकारियों से सलाह लें। प्रदेश के कृषि अनुसंधान केंद्रों, कृषि महाविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों में किसान सलाह केंद्र स्थापित किए गए हैं। लगातार बारिश की स्थिति में सही तकनीक अपनाकर किसान न केवल फसल नुकसान से बच सकते हैं, बल्कि बेहतर उत्पादन भी प्राप्त कर सकते हैं। कृषि विभाग ने किसानों से मौसम के अनुसार खेती की रणनीति अपनाने की अपील की है।

