बस्तर के घने जंगलों में चल रही लंबी लड़ाई के बीच एक बड़ा मोड़ सामने (Paparao Maoist Surrender) आया है। नक्सल संगठन की अहम कड़ी माने जाने वाले पापाराव उर्फ मंगू ने अपने 18 साथियों के साथ हथियार छोड़ दिए हैं। तय समयसीमा से पहले हुआ यह आत्मसमर्पण सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी उपलब्धि और संगठन के लिए गंभीर झटका माना जा रहा है।
बताया जाता है कि सुकमा क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाला पापाराव लंबे समय से नक्सली गतिविधियों का अहम चेहरा रहा है। पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी में उसकी मजबूत पकड़ थी और वह दक्षिण सब जोनल स्तर पर भी सक्रिय भूमिका निभा रहा था। कई अभियानों में उसका नाम सामने आता रहा, जिससे वह सुरक्षा बलों की निगाह में लगातार बना हुआ था।
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घटना बीजापुर जिले के कुटरू थाना क्षेत्र की है, जहां पापाराव अपने साथियों के साथ पहुंचा और आत्मसमर्पण की प्रक्रिया (Paparao Maoist Surrender) पूरी की गई। बाद में सभी को जगदलपुर लाया गया, जहां आगे की कार्रवाई की जा रही है। इस दौरान सुरक्षा बलों ने उनके पास से आधुनिक हथियारों का जखीरा भी बरामद किया—जिसमें एके-47, एसएलआर और इंसास राइफल जैसी घातक बंदूकें शामिल हैं।
इस सरेंडर की एक खास बात यह भी रही कि इसमें महिलाओं की भागीदारी उल्लेखनीय रही। कुल 18 नक्सलियों में 8 महिलाएं (Paparao Maoist Surrender) शामिल हैं, जो संगठन में सक्रिय रूप से काम कर रही थीं। यह संकेत देता है कि अब संगठन के भीतर भी बदलाव की लहर धीरे-धीरे असर दिखा रही है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि पापाराव का आत्मसमर्पण केवल एक व्यक्ति का फैसला नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क पर असर डालने वाला घटनाक्रम है। पश्चिम बस्तर डिवीजन, जो कभी नक्सल गतिविधियों का मजबूत आधार माना जाता था, अब लगातार कमजोर पड़ता नजर आ रहा है।
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पिछले एक साल में बस्तर क्षेत्र में कई बड़े नक्सलियों के मारे जाने या सरेंडर करने की घटनाएं सामने (Paparao Maoist Surrender) आई हैं। इसके चलते संगठन की संरचना और प्रभाव दोनों पर गहरा असर पड़ा है। सुरक्षा एजेंसियों का दावा है कि अब नक्सल नेटवर्क पहले की तुलना में काफी बिखर चुका है।
स्थानीय स्तर पर भी इस बदलाव को महसूस किया (Paparao Maoist Surrender) जा रहा है। जिन इलाकों में पहले भय और अनिश्चितता का माहौल था, वहां अब धीरे-धीरे सामान्य स्थिति लौटने लगी है।
पापाराव और उसके साथियों का यह कदम केवल एक सरेंडर नहीं, बल्कि उस सोच में बदलाव का संकेत (Paparao Maoist Surrender) भी है, जहां बंदूक की जगह अब मुख्यधारा में लौटने का रास्ता चुना जा रहा है। बस्तर में शांति की दिशा में इसे एक निर्णायक पड़ाव माना जा रहा है।
