छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जमीन विवादों और संपत्ति की खरीद-बिक्री को लेकर एक ऐसा कड़ा फैसला (Bilaspur High Court Decision) सुनाया है, जो उन लोगों के लिए बड़ी चेतावनी है जो बिना पूरी जांच-पड़ताल के विवादित संपत्तियों में पैसा फंसाते हैं। जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की सिंगल बेंच ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर आप ऐसी जमीन का सौदा करते हैं
जिसका मामला पहले से ही अदालत में लंबित (Sub-judice) है, तो आपको अलग से पक्षकार बनाने या नोटिस देकर सुनने की कोई कानूनी अनिवार्यता (Bilaspur High Court Decision) नहीं है। कानून की नजर में आप सीधे तौर पर अपने विक्रेता के अधिकारों के उत्तराधिकारी माने जाएंगे, यानी अगर आपका विक्रेता केस हार गया, तो आपकी करोड़ों की संपत्ति भी हाथ से निकल जाएगी।
यह पूरा मामला रायपुर के ग्राम टेमरी स्थित करीब 0.376 हेक्टेयर जमीन (Bilaspur High Court Decision) से जुड़ा है। इस बेशकीमती जमीन को दीप्ति अग्रवाल नाम की महिला ने नवंबर 2025 में बहुरलाल साहू और यतिराम साहू से 1 करोड़ 20 लाख 28 हजार रुपये में खरीदा था। पेंच तब फंसा जब पता चला कि इस जमीन के मालिकाना हक को लेकर संजय कुमार नचरानी और साहू परिवार के बीच राजस्व न्यायालय में पहले से ही जंग चल रही थी।
संजय नचरानी का दावा था कि उन्होंने यह जमीन 1997 में ही खरीद ली थी और उनका नाम रिकॉर्ड में दर्ज था, लेकिन तकनीकी गड़बड़ी के चलते पोर्टल पर पुराना नाम दिखने लगा। इसी भ्रम का फायदा उठाकर साहू परिवार ने जमीन आगे बेच दी।
विवाद के बीच जब राजस्व बोर्ड ने अपना फैसला सुनाया, तो खरीदार दीप्ति अग्रवाल ने हाईकोर्ट का दरवाजा (Bilaspur High Court Decision) खटखटाया। उनकी दलील थी कि वे एक ‘बोनाफाइड परचेजर’ (नेक नीयत खरीदार) हैं और उन्होंने इतनी बड़ी रकम निवेश की है, इसलिए उन्हें बिना सुने कोई आदेश पारित करना उनके अधिकारों का हनन है।
दूसरी तरफ, विपक्षी पक्ष ने तर्क दिया कि जब यह सौदा हुआ, तब मामला कोर्ट में विचाराधीन (Bilaspur High Court Decision) था और विक्रेता खुद सिविल कोर्ट में केस लड़ रहे थे, ऐसी स्थिति में खरीदार को अलग से सुनने की कोई आवश्यकता नहीं है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए खरीदारों के लिए सख्त संदेश (Bilaspur High Court Decision) दिया। जस्टिस अग्रवाल ने अपनी टिप्पणी में कहा कि “इतनी बड़ी राशि खर्च करने से पहले जमीन के रिकॉर्ड की गहराई से जांच करना खरीदार की खुद की जिम्मेदारी थी।”
अदालत ने ‘ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट’ की धारा 55 का हवाला देते हुए कहा कि खरीदार को संपत्ति के दोषों और चल रहे मुकदमों की जानकारी खुद लेनी (Bilaspur High Court Decision) चाहिए। मुकदमेबाजी के दौरान किए गए निजी सौदों के जरिए कोर्ट की शक्तियों को कम नहीं किया जा सकता। इस फैसले ने साफ कर दिया है कि ‘बोनाफाइड परचेजर’ का टैग आपको तब सुरक्षा नहीं दे सकता जब मामला पहले से ही अदालत के संज्ञान में हो।
