Betel Leaf Farming Revival : पान की विलुप्त होती खेती को नया जीवन, यहां अनुसंधान केन्द्र की स्थापना से किसानों को नई उम्मीद

Chhattisgarh News : पारंपरिक कृषि विरासत को पुनर्जीवित करने की दिशा में छत्तीसगढ़ शासन द्वारा एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले के विकासखण्ड छुईखदान में पान की खेती को फिर से स्थापित करने का प्रयास शुरू किया गया है। लंबे समय से तकनीकी मार्गदर्शन और गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री के अभाव में विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुकी पान की खेती अब नई तकनीक, अनुसंधान और सरकारी सहयोग के माध्यम से पुनर्जीवित होती दिखाई दे रही है। इस पूरी पहल को पान की खेती पुनर्जीवन (Betel Leaf Farming Revival) अभियान के रूप में देखा जा रहा है, जिससे क्षेत्रीय किसानों की आय और कृषि विविधीकरण दोनों को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

Betel Leaf Farming Revival
Betel Leaf Farming Revival

विकासखण्ड छुईखदान में पहले बड़े पैमाने पर पान की खेती की जाती थी। यहां के किसानों की आर्थिक व्यवस्था में यह फसल महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। लेकिन समय के साथ तकनीकी जानकारी का अभाव, रोग प्रबंधन की कमी, उचित बाजार संपर्क न होना और प्लांटिंग मटेरियल की अनुपलब्धता के कारण किसानों ने धीरे-धीरे इस खेती से दूरी बना ली। परिणामस्वरूप यह पारंपरिक फसल लगभग समाप्ति की स्थिति में पहुंच गई थी। अब राज्य सरकार द्वारा शुरू की गई पारंपरिक कृषि संरक्षण योजना (Betel Leaf Farming Revival) के तहत इसे फिर से बढ़ावा दिया जा रहा है।

इसे भी पढ़ें : Ram Statue Installation : प्रभु श्रीराम की 51 फीट की ऊंची प्रतिमा मां कौशल्या धाम में होगी विराजित

राज्य शासन ने वर्ष 2023-24 में पान उत्पादन को वैज्ञानिक आधार देने के उद्देश्य से विकासखण्ड छुईखदान में पान अनुसंधान केन्द्र स्थापित करने की घोषणा की। यह अनुसंधान केन्द्र रानी अवंती बाई लोधी कृषि महाविद्यालय छुईखदान परिसर में स्थापित किया गया है, जहां विशेषज्ञों द्वारा पान की उन्नत किस्मों, रोग नियंत्रण, जल प्रबंधन तथा संरक्षित खेती तकनीकों पर शोध किया जा रहा है। इस केन्द्र के माध्यम से किसानों को आधुनिक तकनीकी प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है, जिससे वैज्ञानिक पान उत्पादन मॉडल (Betel Leaf Farming Revival) को जमीन पर उतारा जा सके।

पान उत्पादक किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए उद्यानिकी विभाग द्वारा शेडनेट हाउस निर्माण पर 50 प्रतिशत विभागीय अनुदान प्रदान किया जा रहा है। वर्तमान में सात किसानों ने प्रति कृषक 500 वर्गमीटर क्षेत्र में शेडनेट हाउस का निर्माण कराया है। प्रत्येक किसान को लगभग 1.77 लाख रुपये का अनुदान प्रदान किया गया है। इनमें से छह किसान वर्तमान में संरक्षित वातावरण में पान की खेती कर रहे हैं। शेडनेट तकनीक के उपयोग से तापमान और आर्द्रता नियंत्रित रहती है, जिससे मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों का प्रभाव कम होता है और उत्पादन की गुणवत्ता बेहतर होती है। इसे संरक्षित खेती विस्तार योजना (Betel Leaf Farming Revival) का अहम हिस्सा माना जा रहा है।

इसे भी पढ़ें : Barnawapara Wildlife Sanctuary : बारनवापारा अभयारण्य….जहां हर कदम पर है प्रकृति का रोमांच

विशेषज्ञों का मानना है कि पान की खेती कम भूमि में अधिक आय देने वाली फसल है। यदि वैज्ञानिक पद्धति अपनाई जाए तो किसान पारंपरिक धान या अन्य फसलों की तुलना में कई गुना अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इसी उद्देश्य से कृषि महाविद्यालय के सहयोग से जिले की शासकीय उद्यान रोपणियों—कुकुरमुड़ा और बीरूटोला—में पान की खेती के प्रदर्शन प्लॉट तैयार किए जा रहे हैं। यहां किसानों को प्रत्यक्ष रूप से खेती की आधुनिक तकनीक दिखाई जा रही है ताकि वे आत्मविश्वास के साथ इस फसल को अपनाएं। यह प्रयास कृषि विविधीकरण मॉडल (Betel Leaf Farming Revival) को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

जिला प्रशासन द्वारा इस पूरी पहल की लगातार मॉनिटरिंग की जा रही है। कलेक्टर तथा जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी समय-समय पर स्थल निरीक्षण कर प्रगति की समीक्षा कर रहे हैं और किसानों को आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने के निर्देश (Betel Leaf Farming Revival) दे रहे हैं। वहीं कृषि महाविद्यालय के विषयवस्तु विशेषज्ञ किसानों को पौध प्रबंधन, रोग नियंत्रण, जैविक पोषण और बाजार रणनीति से जुड़ी जानकारी दे रहे हैं। प्रशासन और कृषि वैज्ञानिकों के संयुक्त प्रयास से क्षेत्र में पान उत्पादन का नया मॉडल विकसित किया जा रहा है, जिसे भविष्य में अन्य जिलों में भी लागू किया जा सकता है।

इसे भी पढ़ें : Rewa Raipur Flight Service : रीवा-रायपुर के बीच 15 मार्च से शुरू होगी हवाई सेवा

स्थानीय किसानों का कहना है कि यदि बाजार व्यवस्था और प्रशिक्षण निरंतर मिलता रहा तो पान की खेती एक बार फिर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ (Betel Leaf Farming Revival) बन सकती है। यह पहल केवल एक फसल को पुनर्जीवित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि पारंपरिक कृषि ज्ञान, स्थानीय पहचान और किसानों की आय वृद्धि से भी जुड़ी हुई है। आने वाले वर्षों में छुईखदान क्षेत्र पान उत्पादन का प्रमुख केंद्र बन सकता है, जिससे रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।

सरकार की इस पहल से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि पारंपरिक फसलों को आधुनिक तकनीक से जोड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया (Betel Leaf Farming Revival) जा सकता है। यदि योजनाएं इसी तरह धरातल पर लागू होती रहीं, तो छत्तीसगढ़ में पान की खेती फिर से अपनी पुरानी पहचान हासिल कर सकती है और किसानों के लिए स्थायी आय का स्रोत बन सकती है। यही कारण है कि विशेषज्ञ इस परियोजना को क्षेत्र में कृषि पुनर्जागरण की दिशा में एक निर्णायक कदम मान रहे हैं।