छत्तीसगढ़ में खरीदी की व्यवस्थित सिस्टम फिर बोनस ने बढ़ाया धान का रकबा और उत्पादन
रायपुर। छत्तीसगढ़ में आजीविका के मुख्य साधन कृषि है। 70 प्रतिशत लोग कृषि से जुड़े हुए हैं। प्रदेश में 35 लाख से अधिक किसान परिवार हैं। छत्तीसगढ़ की कुल घरेलू उत्पाद में कृषि की भागादारी 20 प्रतिशत से भी अधिक है। प्रदेश में धान की खरीदी सिस्टम और किसानों को बोनस मिलने के कारण धान का रकबा और उत्पादन साल दर साल बढ़ रहा है। 2000 में प्रदेश में मात्र 4 लाख 63 हजार 104 एमटी धान की खरीदी हुई जो अब 107 लाख एमटी से अधिक पहुंच गई है।
छग में साल 2000 में धान का क्षेत्रफल मात्र 42 हजार 530 हेक्टेयर था, जो वर्तमान 2022-23 में 31 लाख 61 हजार हेक्टेयर अनुमानित है। मतलब बीते 23 सालाें में कई लाख गुना धान की खेती में बढ़ोतरी हुई है। दरअसल, राज्य बनने के पहले किसानों की धान को खरीदने की व्यवस्था नहीं थी। किसान मंडियाें और व्यापारियों के पास औने पौने दाम में बेचा करते थे। धान की सही कीमत नहीं मिलने के कारण सूबे के किसान धान के अलावा अपने खेतों पर अन्य दलहन, तिलहन, साग-सब्जियों का उत्पादन करते थे।
मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद यहां मंडियों में धान बेचने की व्यवस्था बनाई गई थी। इसके बाद सत्ता में 2003 में बीजेपी आयी तो 15 वर्ष में न सिर्फ खरीदी की व्यवस्था भी बेहत्तर हो गई, बल्कि किसानों को धान उत्पादन के लिए बोनस देने की पम्परा भी शुरू हुई। इससे न सिर्फ धान की उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी हो रही, बल्कि रकबा भी साल दर साल बढ़ती जा रही है। हालांकि इस दौरान दूसरे फसलों पर भी सरकार जोर दे रही थीं। प्रदेश में 2003 से 2018 तक बीजेपी की सरकार थी। इस दौरान इन पंद्रह सालों में धान खरीदी का आंकड़ा 27.5 एमटी से बढ़कर 56. 88 एमटी पहुंचा। मतलब पंद्रह सालों में धान की खरीदी दोगुनी हुई।
2018 में कांग्रेस की सरकार आयी। इन पांच सालों में खरीदी में 70 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई। 56.88 एमटी से 107 मीट्रिक टन खरीदी पहुंच गई है। इसकी वजह प्रदेश के किसानों को सबसे अधिक धान की कीमत मिलना है। राज्य की सरकार केंद्र सरकार की एमएसपी के अलावा लगभग 700 रुपए बोनस के रूप में अतिरिक्त पैसे देती है। इसके कारण पिछले पांच सालों में खरीदी न सिर्फ 70 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, बल्कि किसानों की संख्या में भी इजाफा हुआ है।
प्रदेश में भले ही धान खरीदी और किसानों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है, पर दलहन और तिलहन की खेती अब न के बराबर हो रही है। छत्तीसगढ़ में वर्ष 2000-01 में दलहन का क्षेत्रफल 683 हेक्टेयर था और उत्पादन 270 एमटी। ये आंकड़े बढ़कर 2008 तक 1380 हेक्टेयर और उत्पादन 940 एमटी था। मतलब इन 8 सालों में दलहन का रकबा दोगुना और उत्पादन करीब तीन गुना बढ़ गई थी। 2015 में 3589 हेक्टेयर और उत्पादन 2513 एमटी हो गया। इन आठ सालों में रकबा और उत्पादन में ढाई गुना वृद्धि हुई। लेकिन 2022-23 आते-आते दलहन का रकबा अब सिर्फ 8.65 लाख हेक्टेयर रह गई है। इसके पीछे की वजह सिर्फ और सिर्फ सरकार का पूरा फोकस धान खरीदी को लेकर ही है।
| वर्ष | खरीदा गया धान |
| 2003-04 | 27.05 |
| 2004-05 | 28.87 |
| 2005-06 | 35.87 |
| 2006-07 | 37.08 |
| 2007-08 | 33.51 |
| 2008-09 | 37.47 |
| 2009-10 | 44.09 |
| 2010-11 | 50.73 |
| 2011-12 | 59.00 |
| 2012-13 | 70.24 |
| 2013-14 | 78.35 |
| 2014-15 | 62.77 |
| 2015-16 | 59.25 |
| 2016-17 | 69.57 |
| 2017-18 | 56.88 |
| 2018-19 | 80.37
|
| 2019-20
2020-21 2021-22 2022-23 |
83.94
92.80 97.97 107.51 |
