सांसदों को विधायक बनाकर और हारे हुए प्रत्याशियों को चुनावी मैदान में उतारने बीजेपी की यह सियासी गणित समझिए!

रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा 2023 के चुनावी रण के लिए अब तक 86 प्रत्याशियों की घोषणा कर चुकी है। केवल चार सीटों के लिए प्रत्याशी घोषित होना बाकी है। भाजपा ने अब तक घोषित कुल 86 विधानसभा सीटों में जहां 44 नए चेहरों को उतारा है। वहीं, 42 पुराने और सांसदों को मौका दिया गया है। प्रत्याशियों की सूची जारी होते ही राजनीतिक गलियारे में चर्चा शुरू हो गई कि पार्टी ने जिनके नेतृत्व में 2018 का विधानसभा चुनाव लड़ कर अपनी जमीन गंवाई थी, उन्हीं नामों को फिर से टिकट दे दी है। 

पुराने चेहरे में 15 साल तक प्रदेश की कमान संभालने वाले डॉ रमन सिंह, रायपुर दक्षिण से बृजमोहन अग्रवाल, रायपुर पश्चिम से राजेश मूणत, बिलासपुर शहर से अमर अग्रवाल, लता उसेंडी, नवागढ़ से दयालदास बघेल, भैयालाल राजवाड़े, प्रेमप्रकाश पांडेय, केदार कश्यप और महेश गागड़ा, रायगढ़ के लैलूंगा से सुनीति राठिया जैसे नाम शामिल हैं। 

प्रत्याशियों की सूची में इनका नाम देखने के बाद कई प्रत्याशियों के खिलाफ प्रदर्शन की भी खबरें भी सामने आई।  कार्यकर्ताओं में कई पुराने चेहरों को लेकर दुख भी है और गुस्सा भी जाहिर किया। हारे हुए पुराने चेहरों वाले इलाके में, कार्यकर्ताओं के इस दुख और गुस्से से निपटना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती मानी जा रही थी, लेकिन बीजेपी ने इस पर जल्द ही कंट्रोल कर लिया। असंतोष और विरोध के स्वर को जिस तरह से पार्टी ने बेहद कम समय में मैनेज कर लिया। ऐसा किसी ने सोचा भी नहीं था। हालांकि कांग्रेस के मुकाबले बीजेपी इस मामले में हमेशा आगे रही। पार्टी जरूरत पड़ने पर एक्शन लेने में भी पीछे नहीं रहती। 

बीजेपी ने अपने चार सांसदों को भी चुनावी मैदान में उतारा है। इनमें रायगढ़ लोकसभा की सांसद गोमती साय, सरगुजा सांसद रेणुका सिंह, दुर्ग सांसद विजय बघेल और बीजेपी के प्रदेशाध्यक्ष और बिलासपुर से सांसद अरूण साय हैं। बीजेपी ने केवल छत्तीसगढ़ में ही नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश और राजस्थान में भी अपने सांसदों और केंद्रीय मंत्रियों को विधानसभा चुनाव लड़ा रही है।

राजनीतिक जानकारों की मानें तो सबसे पहला और बेहद महत्वपूर्ण कारण तो यह है कि किसी सांसद का आसपास के उन पांच-छह विधानसभाओं पर वर्चस्व होता है जिनसे मिलकर एक लोकसभा क्षेत्र बनता है। वो सांसद निधि से अपने लोकसभा क्षेत्र में आने वाले सभी विधानसभा क्षेत्रों में विकास कार्यों को अंजाम देते हैं। वहीं, संगठन के बड़े नेताओं को टिकट मिलने से निचले स्तर के कार्यकर्ताओं का उत्साह कई गुना बढ़ जाता है। कार्यकर्ताओं का पार्टी से जुड़ाव ही संगठन के नेताओं के जरिए होता है। इस कारण वो अपनी काबिलियत साबित करने के लिए चुनावों में अपने नेता की जीत सुनिश्चित करने को जी-जान लगा देते हैं। इसका फायदा पार्टी को मिलता है।

इसके अलावा बड़े-बड़े चेहरों को चुनाव लड़ाने से पार्टी को राजनीतिक अनुभव और लोकप्रियता का लाभ मिलता है। इन नेताओं के पास चुनाव जीतने का बेहतर मौका होता है और वे पार्टी के लिए वोट जुटाने में भी मदद कर सकते हैं। वहीं बड़े-बड़े चेहरों को चुनाव लड़ाने से विपक्ष को कमजोर करने में मदद मिल सकती है। इन नेताओं के सामने खड़े होने से विपक्षी उम्मीदवारों के लिए चुनाव जीतना मुश्किल हो सकता है। 

बात करें पार्टी के हारे हुए और पुराने चेहरों की तो वे लगातार चुनाव जीतने वाले नेता हैं। चाहे रायपुर पश्चिम से राजेश मूडत हो, नवागढ़ से दयाल दास बघेल हो या फिर बिलासपुर से अमर अग्रवाल अग्रवाल। एक चुनाव हार जाने का मतलब यह नहीं है कि ये पार्टी कार्यकर्ताओं या फिर आम जनता से दूरी बना ली हो। पार्टी द्वारा पुराने नेताओं को एक बार फिर मौका देने की वजह यह भी है कि ये भाजपा के पुराने चेहरे लोकप्रिय रहे हैं, उनके पास कार्यकर्ताओं की अपनी टीम है, चुनाव लड़ने का अनुभव है, अपने विधानसभा क्षेत्र को बहुत अच्छी तरह जानते हैं और चुनावी दांव पेंच को समझते हैं। वैसे भी 2018 में बीजेपी के 50 से 15 सीटों पर सिमटने के कई कारण थे। ऐसे में केवल इन बड़े नेताओं के सिर हार का ठीकरा फोड़ा नहीं जा सकता। इसे पार्टी आलाकमान भी अच्छी तरह जानता और समझता है। इसलिए पुराने चेहरे पर पार्टी का भरोसा बरकरार है। 

दूसरी ओर कांग्रेस ने भी अब तक 90 में से 83 सीटों पर प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं। कांग्रेस ने अपने 18 मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर कुल 27 नए चेहरों को मौका दिया है। इसके पीछे जो कारण अब तक सामने आया है, उसके अनुसार क्षेत्र में कमजोर प्रदर्शन और फीडबैक रहा। कांग्रेस की सूची जारी होने के बाद यहां भी सिर फटौव्वल की नौबत है। कांग्रेस के मुकाबले बीजेपी टिकट जारी करने में 20 साबित हुई। पार्टी ने समय रहते उठी असंतोष की लहर को संतोष कर लिया। फिलहाल इस मामले में कांग्रेस बहुत पीछे नजर आ रही है। क्योंकि कांग्रेस के पांच मौजूदा विधायकों ने निर्दलीय या फिर दूसरी पार्टियों से चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। इनमें अंतागढ़ से अनूप नाग, डोंगरगढ़ से भुनेश्वर बघेल, मनेंद्रगढ़ से विनय जायसवाल और कोरबा के पाली तानाखार से मोहित केरकेट्‌टा शामिल हैं। जिस तरह से कांग्रेस में वर्तमान स्थिति है। इससे 75 पार का नारा तो दूर सत्ता बरकरार रखने में भी मुश्किलें खड़ी हो सकती है। 

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छत्तीसगढ़ में आजीविका के मुख्य साधन कृषि और वन आधारित है। 70 प्रतिशत लोग कृषि से जुड़े हुए हैं। प्रदेश में 35 लाख से अधिक किसान परिवार हैं। एक समय धान के साथ-साथ दलहन और तिलहन की खेती भी किसान खूब करते थे। दलहन में चना, अरहर, मूंग, मसूर, उड़द आदि, वहीं तिलहन में मूंगफली, सोयाबीन, सूरजमुखी, अलसी, सरसों आदि की खेती भी छत्तीसगढ़ में हो रही थी, लेकिन अब धान ही मुख्य फसल रह गई है। इससे साल दर साल धान का रकबा बढ़ रहा है तो वहीं तिलहन और दलहन में बड़ी गिरावट दर्ज हो रही है। दलहन और तिलहन को तिलांजलि देकर धान की खेती के बढ़ते रुझान पर चिंताजनक है। यह किसानों के लिए भविष्य में घाटे का सौदा साबित होगी। यह न सिर्फ अलाभकारी बल्कि खेत की मिट्टी के लिए भी नुकसानदेह होगी।

आंकड़ों पर नजर डाले तो साल 2000 में धान का क्षेत्रफल 42 हजार 530 हेक्टेयर था, जो वर्तमान में 31 लाख 61 हजार हेक्टेयर अनुमानित है। मतलब बीते 22 सालाें में कई लाख गुना धान की खेती में बढ़ोतरी हुई है। दरअसल, राज्य बनने के पहले किसानों की धान को खरीदने की व्यवस्था नहीं थी। किसान मंडियाें और व्यापारियों के पास औने पौने दाम में बेचा करते थे। मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद यहां मंडियों में धान बेचने की व्यवस्था बनाई गई थी। इसके बाद सत्ता में 2003 में बीजेपी आयी तो 15 वर्ष में न सिर्फ खरीदी की व्यवस्था भी बेहत्तर हो गई, बल्कि किसानों को धान उत्पादन के लिए बोनस देने की पम्परा भी शुरू हुई। इससे न सिर्फ धान की उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी होती गई, बल्कि रकबा भी साल दर साल बढ़ने लगा।

20 क्विंटल प्रति एकड़ 28 सौ रुपए कीमत : छत्तीसगढ़ में इस साल 2023-24 खरीफ सीजन में सरकार ने प्रति एकड़ 20 क्विटल खरीदी करने और 28 सौ रुपए कीमत देने का ऐलान किया है। इसमें केंद्र की तरफ से 22 सौ रुपए और 6 सौ रुपए बोनस के रूप में राज्य सरकार से किसानों को मिलेगी। हालांकि प्रदेश के सभी इलाकों में प्रति एकड़ 20 क्विंटल उत्पादन नहीं होता। क्योंकि सिंचाई के साधन उपलब्ध नहीं है। इसके बाद भी सरकार किसानों की वोट बैंक के लिए यह निर्णय लिया है।

सीमांत किसानों की बढ़ रही संख्या : राज्य निर्माण के बाद तीन बार कृषि जनगणना हुई है। वर्ष 2004-05, 2010-11 और 2015-16 में हुई। तीनों कृषि जनगणना की आंकड़ों से ज्ञात होता है कि प्रदेश में कृषि जोत का आकार कम हो रहा है। वहीं सीमांत किसानों की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी देखने को मिल रही और लघु, मध्यम और बड़े किसानों की संख्या और उनका औसत रकबा कम हो रहा। 2015 में कृषि जनगणना के अनुसार प्रदेश में 70 प्रतिशत किसान सीमांत है। जिनका औसत रकबा 1 एकड़ है। सीमांत किसानों में अनुसूचित जाति वर्ग के किसानों की संख्या 3 लाख 24 हजार है। इनके पास कुल 1 लाख 34 हजार हेक्टेयर मतलब 3 लाख 4 हजार एकड़ भूमि है। वहीं अनुसूचित जनजाति वर्ग के 5 लाख 32 हजार सीमांत किसान हैं जिनके पास कुल 2 लाख 35 हजार हेक्टेयर मतलब 5 लाख 96 हजार एकड़ जमीन है।

सरकार की योजना से बड़े किसानों को ही फायदा : छत्तीसगढ़ सरकार वर्तमान में प्रति एकड़ 20 क्विंटल खरीदी और 28 सौ रुपए कीमत देने का ऐलान किया है। पिछले खरीफ सीजन तक बात करें तो प्रति एकड़ 15 क्विंटल और 26 सौ रुपए कीमत दी। वर्तमान धान खरीदी की नीति पर गौर करें तो केवल बड़े किसानों को ही लाभ हो रहा है। लघु व सीमांत किसानों को कोई फायदा नहीं हुआ है। 70 प्रतिशत किसानोंं की आय में बढ़ोतरी नहीं हुई है।

धान की रकबा बढ़ने का दुष्प्रभाव : छत्तीसगढ़ में धान उत्पादन का क्षेत्रफल बढ़ा, लेकिन दहलन, तिलहन, गन्ना, साग सब्जी, फल और अन्य अनाज की फसलों की तिलांजलि दे दी गई। अब न सिर्फ खरीफ में धान उत्पादन हो रहा, बल्कि ग्रीष्मकालीन यानि रबी सीजन में भी अपनी सिंचाई व्यवस्था कर धान की ही खेती की जा रही है। इससे पानी का संकट, जमीन पर विपरीत प्रभाव, सामाजिक तनाव, मौसम में बदलाव, गर्मी बढ़ रही, दलहन तिलहन का उत्पादन कम होने के कारण महंगाई पर भी असर डाला है।

कागजों में दलहन उत्पादन प्रोत्साहन योजना : वर्तमान समय में किसानों का रूझान धान की फसल उत्पादन करने में ही है। प्रदेश में 35 लाख किसान परिवार है। इसे देखते हुए सरकार का रूझान भी धान के जरिए ही किसानों को रिझाने में है। इसके लिए खरीदी की लिमिट, कीमत बढ़ाने के साथ ही बोनस भी दे रही, लेकिन दलहन और तिलहन की घट रही रकबा को रोकने के लिए कोई ठोस योजना या कदम नहीं उठा रही। हालांकि सरकार दलहन उत्पादन प्रोत्साहन योजना चला रही, पर आंकड़ों पर नजर डालेंगे तो पता चलता है कि यह महज दिखावे के अलावा कुछ भी नहीं है। सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार 2019-20 में भौतिक लक्ष्य 46100 क्विंटल के विरूद्ध 33737 क्विंटल उत्पादन हुआ। इसके लिए 277 लाख रुपए व्यय किया गया। इसी तरह 2020-21 में 46100 के विरूद्ध मात्र 8884 क्विंटल उत्पादन, इसके लिए 133 लाख व्यय। ऐसा ही हाल 2021-22, 2022-23 में भी देखने को मिला।

 

year paddy purchased 

2000-01         463104

2001-02         1334227

2002-03          1474382

2003-04          2705067

2004-05          2886730

2005-06         3586742

2006-07         3714281

2007-08         3151005

2008-09         3747000

2009-10         4408696

2010-11         5073384

2011-12          5900572

2019-20           8394000

2012-13          7121939

2013-14          7972156

2014-15           6310424

2015-16           5929232

2016-17           6959059

2017-18           5688938

2018-19           8038030

2020-21           9280000

2021-22           9797000

2022-23          10751000