कभी गांवों का जरूरी हिस्सा थे हैंडपंप, 2 सालों में ही 20 हजार से अधिक गायब ….
रायपुर। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (पीएचई) की अति महत्वपूर्ण नल जल योजना का इन दिनों पूरे प्रदेश में बुरा हाल है। गर्मी शुरू होने के पहले प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में पीने की पानी के लिए त्राहिमाम शुरू हो जाती है। लोगों को इस समस्या से छुटकारा दिलाने के लिए सरकार कई योजनाएं संचालित कर रही हैं। इनमें से एक प्रमुख योजना है ग्रामीण नल जल योजना जो प्रदेश में दम तोड़ती नजर आ रही है।
वर्ष 2003 के एक सर्वेक्षण के अनुसार राज्य में कुल 19 हजार 744 गांवों में 72 हजार 775 बसाहटें थीं। इन गांवों को पानी उपलब्ध कराने के लिए चिन्हित किया गया था। छत्तीसगढ़ में जब 2008 में भाजपा की सरकार ने पेयजल संकट को दूर करने के लिए ठोस योजना बनाई। इसके बाद 2007-2008 में 71 हजार 714 बसाहटों में पेयजल व्यवस्था कराई गई।
2011 जनगणना में प्रदेश में गांवों की संख्या और बसाहटें दोनों में बढ़ोतरी हुई। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक गांवों की संख्या 20 हजार 126 थीं। जबकि बसाहटें 73 हजार 616 हो गई। तात्कालीन सरकार ने वर्ष 2014-15 में ग्रामीण नल जल योजना के तहत 2833 योजनाओं को स्वीकृति दी और 2400 योजनाएं पूर्ण किए गए। वहीं वित्तीय वर्ष 2015-16 में 3230 योजनाओं की स्वीकृति दी जिसमें 2587 काम पूरे किए।
प्रदेश में 2018 में कांग्रेस की सरकार आयी। दिसंबर 2020 की स्थिति में गांवों की संख्या 19 हजार 683 थीं। बसाहटों की संख्या 74 हजार 929 था। कांग्रेस सरकार ने बीजेपी की तुलना में योजनाओं की स्वीकृति ज्यादा दी। दिसंबर 2020 की स्थिति में 4 हजार 614 योजनाओं की स्वीकृति दी जिसमें 3985 पूर्ण कराए गए। जबकि दिसंबर 2022 की स्थिति में 4551 योजनाओं की स्वीकृति पर 4406 काम पूरा कराए गए।
हालांकि बीजेपी की तुलना में कांग्रेस सरकार ने हैंडपंप की संख्या में कटौती कर दी। प्रदेश में कभी हैंडपंप ग्रामीण जन जीवन का एक जरूरी हिस्सा हुआ करते थे। पीने के पानी की जरूरतों को पूरा करते थे, लेकिन प्रदेश में गांवों में हैंडपंप अब धीरे-धीरे गायब होने लगे हैं। इसकी संख्या 2018 के बाद तेजी से घटे। छत्तीसगढ़ में 2000-2001 में हैंडपंप की संख्या 7 हजार 559 थीं जो 2008 तक बढ़कर 14114 हो गई। वहीं 7 सालों में इसमें उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई और 2014 तक इनकी संख्या 2 लाख 44 हजार 870 हो गई। इसके बाद दिसंबर 2020 तक 2 लाख 81 हजार 884 थे, जो दिसंबर 2022 तक 2 लाख 61 675 हो गई। मतलब इन दो सालों के दौरान प्रदेश में 20 हजार से अधिक हैंडपंप गायब हो गए।
