हाथी-मानव द्वंद्व छत्तीसगढ़ में ज्वलंत समस्या, 15 जिलों तक बढ़ा दायरा रायपुर। छत्तीसगढ़ एक समय तक केवल नक्सल समस्याओं से त्रस्त था, लेकिन अब आजकल एक नई समस्याओं से ग्रस्त है। ये समस्या हैं जंगली हाथी। बहुत ही कम अवधि में प्रदेश के 45 से अधिक फीसदी क्षेत्रों में जंगली हाथियों ने अपना दायरा बढ़ा लिया है।
कुछ साल तक इनका दायरा छत्तीसगढ़ के कोरबा, कोरिया, रायगढ़, जशपुर व सरगुजा के वन क्षेत्रों तक ही हुआ करता था, लेकिन अब महासमुंद, बलौदाबाजार, गरियाबंद, बलरामपुर, सूरजपुर, गरियाबंद, कांकेर, धमतरी, बालोद, राजनांदगांव समेत 15 जिलों में तक फैल चुके हैं।
इन इलाकों में हालत लगातार बिगड़ रही है। हाथियों के हमलों में अब तक हजारों लोग मारे जा चुके हैं। पिछले तीन सालाें की ही बात करें तो 207 लोगों ने अपनी जान गंवाई। इस दौरान 50 से अधिक हाथियों की भी मौत हुई है। अरबों की संपत्ति का नुकसान तो हुआ ही है। हाथी किसानों की खड़ी फसल बरबाद कर रहे हैं। लोगों के घर गिरा रहे हैं। हाथी प्रभावित इलाकों में लोग अपना घर छोड़कर सामुदायिक केंद्रों में रहने को मजबूर हैं। रतजगा किया जा रहा है। बच्चों का स्कूल तक छूट गया है।
यह समस्या जितनी बड़ी है इससे निपटने के प्रयास उतने ही मामूली किए जाते रहे हैं। हाथी की समस्या से निपटने के लिए सरगुजा में लेमरू और कोरबा वन्य जीव अभयारण्यों को विकसित करने तथा वन्य जीव कॉरीडोर बनाकर जंगलों को जोड़ने का वादा था, लेकिन 5 साल में सरकार इस समस्या को खत्म करने में न तो सफल हुई, न ही इतने उपाय किए, जिससे हाथी और मानव द्वंद को कम किया जा सके।
धान खिलाकर रोकने की उपाय फेल : छत्तीसगढ़ सरकार ने 2 साल पहले एक प्लान बनाया था कि धान खिलाकर हाथियों के उत्पात को रोका जाएगा। इस प्लान के तहत सरकार ने कहा कि वन विभाग प्रभावित गांवों के बाहर धान का ढेर रखवाएगा। इससे भोजन की तलाश में निकले गजराज के दल को गांव के बाहर ही भरपेट भोजन मिल जाएगा और वे गांवों में घुसकर जान-माल का नुकसान नहीं करेंगे। यह खरीदी छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी विपणन महासंघ से की जानी है, लेकिन यह काम भी कागजों में ही हुआ।
100 करोड़ का रेस्क्यू सेंटर का पता नहीं : राज्य सरकार ने 4 वन मंडल कोरबा, कटघोरा, धरमजयगढ़ व सरगुजा के 1995 हेक्टेयर जंगल को शामिल कर लेमरू एलीफेंट रिजर्व बनाने की घोषणा की। इसका सर्वे किया। सीएम भूपेश बघेल ने रिजर्व के भीतर ही 100 करोड़ का रेस्क्यू सेंटर बनाने की घोषणा की। संभावना थी कि रिजर्व बनने के बाद लोगों को कुछ राहत मिल सकती है। 2007 में केंद्र से मंजूरी मिलने के बावजूद यह योजना कभी अधिग्रहण तो कभी सर्वे जैसे कारणों से रुकी हुई थी और अब तक योजना कागजों में ही दौड़ रही।
हुल्ला पार्टी से लेकर कुमकी तक हो गए फेल : हाथियों से बचाव के सभी उपाय फेल हुए हैं। सबसे पहले पश्चिम बंगाल से वर्ष 2007-08 में हुल्ला पार्टी को बुलाया गया। जो हाथियों को खदेड़ने का काम करती थी। यह प्रयास कारगर नहीं हुआ। कुमकी (तमिल में कुमकी का अर्थ प्रशिक्षित हाथी) को बुलाकर कंट्रोल करने की योजना कारगर नहीं हुई। हाथियों को प्रशिक्षित करने असम से पार्वती बरुआ भी आईं लेकिन जशपुर में प्रशिक्षण के दौरान एक हाथी की मौत के बाद वापस चली गईं।
हिंसक होने के क्या कारण….
वनों का घटना….आधुनिकता के नाम पर पिछले कुछ सालोंं में वनों का इतना विनाश किया गया है कि जंगल अब घट गए हैं। वनों के कम होने के कारण उनके अस्तित्व पर संकट आ गया है। जंगल में हाथियों के खाने पीने की कमी शहरों और गांवों की ओर कूच करने के लिए मजबूर हुए हैं।
नदियों का सूखना : वातावरणीय परिवर्तन के साथ ही वनों की अधिक कटाई के कारण नदियां मौसमी वातावरण बनकर रह गई है। इसके कारण केवल वर्षा ऋतु में पानी रहता है। गर्मी की मौसम में पूर्णता सूख जाती है। इसके कारण हाथी जंगल से निकल कर अन्य जल संरक्षित मतलब गांवों की ओर रूख करने को मजबूर हुए हैं।
खाने पीने की चीजों की समस्या : वनों का लगातार नाश हाे रहा है। इसके कारण जंगल में हाथियों के खाने का अकाल पड़ रहा। जिससे अनाज की खोज में गांवों में घुस रहे। इससे आर्थिक और शारीरिक क्षति पहुंचा रहे।